Saturday, 11 July 2026

"महत्त्वाकांक्षा का ज़हर"

 "महत्त्वाकांक्षा का ज़हर"

महत्त्वाकांक्षा का ज़हर सबसे पहले उन्हें पीड़ा देता है जो हमारे सबसे क़रीब होते हैं।

वे हमारे सपनों की कीमत चुकाते हैं—
बच्चे, जो हमारे समय के भूखे रह जाते हैं।    
जीवनसाथी, जो हमारे साथ की प्रतीक्षा करता रह जाता है।
माता-पिता, जो हमारी एक मुस्कान के लिए तरस जाते हैं।
मित्र, जिनसे रिश्ते धीरे-धीरे औपचारिक हो जाते हैं।

जब सफलता ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन जाती है,
तो संवेदनाएँ पीछे छूटने लगती हैं।
घर एक पड़ाव बन जाता है,
और रिश्ते उपलब्धियों के नीचे दबने लगते हैं।

विडंबना यह है कि
जिस सफलता के लिए हम अपनों का साथ खो देते हैं,
उसी सफलता का आनंद लेने के लिए
अंत में वही अपने नहीं बचते।

महत्त्वाकांक्षा अच्छी है,
यदि वह सेवा, सृजन और विकास का माध्यम बने।
लेकिन यदि वह अहंकार, तुलना और अंतहीन दौड़ में बदल जाए,
तो उसका पहला शिकार हमारे सबसे प्रिय लोग बनते हैं,
और अंततः हम स्वयं भी।

इसलिए सफलता का नहीं,
संतुलन का सपना देखिए।
ऐसी ऊँचाइयाँ चुनिए,
जहाँ पहुँचकर अपने भी साथ हों।
::: 

"अनियंत्रित महत्त्वाकांक्षा का पहला शिकार हमारे अपने होते हैं, और अंतिम शिकार हम स्वयं।"

हे परमात्मा!

 हे परमात्मा!

तेरे बनाए इस संसार में
हम माया के जाल में उलझे हैं,
त्रिगुणों के बंधन में बँधे हैं।

कभी रजोगुण हमें दौड़ाता है,
कभी तमोगुण हमें गिराता है,
सत्त्व भी हमें तुझ तक नहीं पहुँचा पाता।

जन्मों से यही खेल चलता रहा।
अब बहुत हुआ, प्रभु।

अब हमें हमारे ही मन से मुक्त कर दो।
माया के पार उतार दो।
अज्ञान के पार उतार दो।
अहंकार के पार उतार दो।

हमें संसार से नहीं,
स्वयं से तार दो।

हे प्रभु!
अब नाव हमारी नहीं,
पतवार भी हमारी नहीं—
अब तुम ही पार उतार दो।

हे माँ काली! मुझे जगा दो

 

हे माँ काली! मुझे जगा दो

हे माँ काली!

रक्तबीज के समान मेरी मूर्खता है,
मेरी जड़ता है,
मेरा अज्ञान है।

रक्तबीज का वध करना सरल था,
क्योंकि उसके प्रत्येक रक्तकण से
केवल एक नया असुर जन्म लेता था।

पर मेरे भीतर तो
हर विचार से नया भ्रम जन्म लेता है,
हर इच्छा से नया अहंकार,
हर भय से नया अंधकार।

माँ, मेरी जड़ता का अंत करना
अत्यंत कठिन है।
तुम्हें बहुत श्रम करना होगा।
युगों से जमी इस अचेतनता को
तुम्हारी करुणा ही पिघला सकती है।

मुझे अपनी मूर्खता पर जितना विश्वास है,
उससे कहीं अधिक विश्वास
तुम्हारी कृपा पर है।

मुझे अपने पतन का ज्ञान है,
पर उससे भी अधिक
तुम्हारे उठाने वाले हाथ पर भरोसा है।

हे महाकाली!
अपने ज्ञान-खड्ग से
मेरे अज्ञान का मस्तक काट दो।
अपने करुणामय स्पर्श से
मेरी सोई हुई चेतना जगा दो।

माँ, मुझे चेतना दो।
माँ, मुझे विवेक दो।
माँ, मुझे सत्य का प्रकाश दो।
माँ, मुझे ऐसा हृदय दो
जो केवल तुम्हें ही खोजे।

मैं योग्य नहीं हूँ,
फिर भी तुम्हारा पुत्र हूँ।

माँ, मुझे ठुकराना मत।
मेरे दोष मत गिनो,
मेरी पुकार सुनो।

अपने इस भटके हुए पुत्र को
अपनी गोद में स्थान दो।
मुझे अपने चरणों में बैठाकर
ऐसा जगा दो
कि फिर कभी अज्ञान की नींद न आए।

हे माँ!

मेरा सबसे बड़ा शत्रु संसार नहीं,
मेरा अपना अज्ञान है।

और मेरी सबसे बड़ी आशा भी संसार नहीं—
केवल तुम हो।

माँ, मुझे अपना लो।
मुझे जगा दो।
मुझे चेतना दो।
मुझे ज्ञान दो।
मुझे अपने प्रेम में विलीन कर लो।

मेरी जड़ता का पर्वत

 

मेरी जड़ता का पर्वत

मेरी जड़ता का टूटना इतना सरल नहीं है,
हे परमात्मा!
तुम्हें बहुत श्रम करना होगा।
युगों से जमी इस कठोरता को पिघलाने में
शायद तुम्हें भी मेरी पीड़ा के मार्ग से होकर गुजरना पड़े।

मैं स्वर्ण-मृग से भी अधिक छलपूर्ण हूँ;
मेरा मन प्रतिक्षण नए भ्रम रचता है।
मैं खर-दूषण से भी अधिक धूर्त हूँ;
अपने ही विवेक को छलकर
बार-बार अंधकार का पक्ष लेता हूँ।

मेरी मूर्खता की कोई सीमा नहीं,
मेरी जड़ता का कोई किनारा नहीं।
अहंकार की मोटी परतों के नीचे
मेरी चेतना जैसे सो गई है।

हे कृष्ण!
अपने सुदर्शन चक्र की धार और तीक्ष्ण कर दीजिए।
उसकी धार मेरे शरीर पर नहीं,
मेरे अहंकार पर चले;
मेरे मोह पर चले;
मेरे अज्ञान पर चले;
मेरी जड़ता पर चले।

मेरे भीतर छिपे
महिषासुर का अभिमान,
रावण का दंभ,
कंस का भय,
और शिशुपाल का अपराध—
सब आपके एक संकेत से समाप्त हो जाएँ।

यदि कुछ चाहिए,
तो केवल जागी हुई चेतना चाहिए।

यदि मुझे जगाने के लिए
मेरे भ्रम टूटें,
मेरा अभिमान चूर हो—
तो भी मुझे स्वीकार है।

बस एक वरदान दीजिए प्रभु—
जब आपका सुदर्शन
मेरे अज्ञान को काटे,
तब मैं उस पीड़ा से भागूँ नहीं,
उसे आपकी करुणा का स्पर्श समझ सकूँ।

मेरी जड़ता चाहे जितनी विशाल हो,
आपकी कृपा उससे कहीं अधिक विराट है।
मेरी मूर्खता चाहे जितनी गहरी हो,
आपका प्रकाश उससे कहीं अधिक प्रखर है।

एक दिन ऐसा आए
जब मैं यह न कहूँ कि
"मैं जड़ हूँ"—
बल्कि मौन होकर अनुभव करूँ—

"मैं उसी चेतना का अंश हूँ,
जिससे यह समस्त सृष्टि प्रकाशित है।"

मैं पर्वत से भी भारी हूँ

 मैं पर्वत से भी भारी हूँ

मैं संजीवनी पर्वत से भी भारी हूँ,
हे पवनसुत! मेरे दोषों का भार अपार है।
मैं गोवर्धन से भी भारी हूँ,
हे गिरिधर! मेरा अहंकार ही मेरा संसार है।

मेरी मूर्खता महिषासुर से भी प्रचंड,
मेरे भ्रमों का नहीं कोई अंत।
हर कदम पर मैं स्वयं से हारता हूँ,
अपने ही बनाए अंधेरों में भटकता हूँ।

फिर भी एक आशा भीतर जलती है,
तेरी करुणा कभी नहीं थकती है।
जिसने पर्वत को अँगुली पर धारा,
वह मेरे जीवन का भार भी उतारेगा सारा।

जिसने संजीवनी उठाकर प्राण बचाए,
वह मेरे टूटे हुए विश्वास भी जगाए।
जिसने असुरों का अभिमान मिटाया,
वह मेरे भीतर के अज्ञान को भी हर ले जाएगा।

मैं योग्य नहीं, यह मैं जानता हूँ,
पर तेरे प्रेम की सीमा नहीं मानता हूँ।
मेरी शक्ति समाप्त हो सकती है,
पर तेरी कृपा कभी समाप्त नहीं होती।

इसलिए मैं निराश नहीं हूँ,
मैं अकेला नहीं हूँ।
यदि तू मेरे साथ है प्रभु,
तो मेरा सबसे भारी बोझ भी
तेरी मुस्कान में हल्का हो जाएगा।

हे प्रभु!
मैं भार नहीं बनना चाहता,
मुझे अपने प्रेम में इतना हल्का कर दे
कि एक दिन मेरा मन भी
तेरे नाम की हवा में
हनुमान की छलाँग जैसा निर्भय हो जाए।

Monday, 22 June 2026

वो सौदागर

 

वो सौदागर

वो सौदागर,
जो किसी के बच्चों को गुमराह करके
धनवान और शक्तिशाली बनते हैं।

वे महलों में रह सकते हैं,
दौलत के अंबार लगा सकते हैं,

पर जिन हाथों ने
मासूमियत का सौदा किया हो,

उनकी सफलता पर
हमेशा एक अदृश्य कलंक लिखा रहता है।

दूसरों के बच्चों के भविष्य को बेचकर
कमाया गया धन,

धन नहीं होता—

वह आने वाली पीढ़ियों की आहों से
भरी हुई तिजोरी होती है।॥

यदि मनुष्यता मर गई,

 

अपने बेटे को किसी का गुंडा मत बनाना

अपने बेटे को किसी का गुंडा मत बनाना,
नहीं तो उससे पाप की बू आएगी।

भले ही वह महंगे कपड़े पहने,
मजबूत शरीर बनाए,
लोग उससे डरें भी—

पर यदि मनुष्यता मर गई,
तो वह चलता-फिरता रोग होगा।

याद करो उस मासूम को,
जब वह पहली बार तुम्हारी गोद में आया था।

कितनी खुशियाँ मनाई थीं तुमने,
कितने सपने सजाए थे उसके लिए।

पर धीरे-धीरे संसार उसे निगल जाता है,
अहंकार, लालच और हिंसा उसे घेर लेते हैं।

और एक दिन,
मनुष्य का शरीर तो बचा रहता है,
पर भीतर का इंसान मर जाता है।

तब वह बेटा नहीं रहता,
सिर्फ एक पशु बन जाता है।

इसलिए उसे धन से पहले संस्कार देना,
ताकत से पहले करुणा देना,
और सफलता से पहले इंसानियत देना।

क्योंकि अंत में वही बेटा महान कहलाता है,
जिससे लोगों को भय नहीं,
विश्वास और प्रेम मिले।॥

अपने बेटे को किसी का गुंडा मत बनने देना

 

अपने बेटे को किसी का गुंडा मत बनने देना

(एक प्रेरणादायक हिंदी कविता)

अपने बेटे को किसी का गुंडा मत बनने देना,
उसे पढ़ाना, उसे संस्कार देना।
उसे सत्य की राह दिखाना,
मानवता का दीप जलाना।

उसे सिखाना सम्मान करना,
निर्बल का भी मान करना।
शक्ति मिले तो रक्षा करना,
कभी न अन्याय का साथ देना।

उसे सिखाना मेहनत करना,
अपने सपनों को सच करना।
ज्ञान की ज्योति मन में भरना,
अंधकार से कभी न डरना।

उसे बताना क्रोध की ज्वाला,
घर-समाज सब जला देती है।
प्रेम, दया और करुणा की गंगा,
जीवन को सुंदर बना देती है।

उसे जीना भी सिखलाना,
हार में भी मुस्कुराना।
सफलता पर विनम्र रहना,
दुख में भी हिम्मत न खोना।

धन-दौलत से बड़ा चरित्र है,
पद-प्रतिष्ठा से बड़ा सत्य है।
जो मानवता को भूल गया,
उसका जीवन ही व्यर्थ है।

अपने बेटे को किसी का गुंडा मत बनने देना,
उसे पढ़ाना, उसे संस्कार देना।
नहीं तो वह भय फैलाने वाला प्राणी बनेगा,
पर यदि शिक्षा और सद्गुण मिले,
तो समाज का उजियारा बनेगा।

वह लोगों के दिलों में सम्मान पाएगा,
अपने कर्मों से दुनिया सजाएगा।
इसलिए उसे इंसान बनाना,
बस यही सबसे बड़ा खजाना।


Sunday, 5 April 2026

 जीने की राह – शुरुआत


कक्षा ग्यारह की वो दोपहर,

जब शब्दों ने ली पहली लहर।

“आईना” समझा रहे थे पारे सर,

भावों का खुला नया सा घर।


उनकी वाणी में था जादू,

हर पंक्ति में जीवन का साधु।

सुनते-सुनते मन यूँ बहका,

एक छात्र ने लिखना सीखा।


कलम उठी, भाव जागे,

अक्षर अपने रास्ते भागे।

यहीं से शुरू हुई वो चाह—

लिखने लगा मैं "जीने की राह"।

Saturday, 4 April 2026

“क्यों जपूँ नाम?”

 

“क्यों जपूँ नाम?”

क्यों भगवान के नाम जपूँ
क्या इसलिए कि वो कुछ देंगे?
क्या सौदा है ये भक्ति का
कि बदले में सुख ही मिलेंगे?

क्यों उन पर पूजा-पाठ का
मैं कोई एहसान करूँ?
जो स्वयं सबका आधार हैं
उन्हें मैं क्या अर्पण करूँ?

क्यों उनके होते हुए भी
रो-रो कर ये जतलाऊँ मैं,
कि वो मेरा ख्याल नहीं रखते—
क्या इतना अंधा हो जाऊँ मैं?

साँस-साँस में वो बसते हैं,
हर धड़कन में उनका नाम,
फिर भी मैं बाहर ढूँढ रहा
अपना ही खोया हुआ धाम।

भक्ति अगर व्यापार बने,
तो प्रेम कहाँ रह जाएगा?
स्वार्थ के इस छोटे घेरे में
ईश्वर भी सिमट जाएगा।

अब समझा हूँ—नाम जपूँ
तो बस अपने मन को शांत करूँ,
उनसे कुछ पाने के लिए नहीं,
खुद को उनके योग्य करूँ।

ना कोई सौदा, ना अपेक्षा,
बस एक सरल सा भाव रहे—
जो कुछ भी है, जैसा भी है,
सबमें तेरा ही प्रभाव रहे।

Tuesday, 10 March 2026

आत्मजागरण की कविता

 आत्मजागरण की कविता

मत मारो स्वयं को,
तुम्हारा जीवन अमूल्य है।

क्यों किसी के भरोसे रहते हो
कि कोई तुम्हें खुशी देगा?
खुशी कोई और नहीं देता,
वह तो भीतर से जन्म लेती है।

भूल जाओ उन पुरानी जगहों को
जिन्होंने कभी सुख दिया था।
न वह समय लौटेगा,
न वे लोग,
न वही परिस्थितियाँ।

जीवन एक नदी की तरह है—
वह कभी पीछे नहीं बहती।
वह बस आगे बढ़ती है,
नए रास्ते बनाती है,
नई धुन गाती है।

तुम भी नदी बनो—
बहते रहो,
रुकना मत,
और अपने भीतर
नया आनंद खोजते रहो। 🌊✨

Saturday, 7 March 2026

अपमान से सीखो

 सीखो —

हार से सीखो,
अपमान से सीखो,
धोखे की उस आग से सीखो
जो भीतर सब कुछ जला देती है।

जब अपमान का ज़हर
सीने में उतरता है,
जब विश्वास टूटकर
हजार टुकड़ों में बिखरता है,
जब रातें लंबी हो जाती हैं
और आँसू ही साथी बन जाते हैं—
तब मन चीखता है,
“अब बस… अब और नहीं!”

पर उसी क्षण
एक सच्चा योद्धा जन्म लेता है।

वह अपने आँसुओं को
कमज़ोरी नहीं बनने देता,
वह अपने घावों को
हार नहीं बनने देता।

वह दर्द को पकड़ता है,
उसे आग बनाता है,
और उसी आग में
अपना नया भाग्य गढ़ता है।

याद रखो —
अपमान तुम्हें तोड़ने नहीं आया,
वह तुम्हें जगाने आया है।

धोखा तुम्हें गिराने नहीं आया,
वह तुम्हें दुनिया की सच्चाई दिखाने आया है।

और हार?
हार तुम्हें खत्म करने नहीं आई—
वह तुम्हें सिखाने आई है
कि कैसे अजेय बनते हैं।

इसलिए उठो…
आँसू पोंछो…
दिल में आग भरो…

और दुनिया को बता दो —
तुम वह इंसान हो
जो दर्द में भी खड़ा रहता है,
जो टूटकर भी नहीं बिखरता,
और जो हर घाव से
एक नया इतिहास रचता है।

क्योंकि याद रखो —
दर्द केवल घाव नहीं देता,
वह भीतर जागरण जगाता है,
और उसी जागरण से
एक नया योद्धा जन्म पाता है।

“कभी भी नहीं हारना”

 कविता: “कभी भी नहीं हारना” 

कभी भी नहीं हारना,
चाहे कितना भी दिल जले,
आँसू भीतर ही बहते हों,
और मन चुपचाप सहे।

आत्मा यदि पीड़ा से भरी हो,
रास्ते धुंधले पड़ जाएँ,
फिर भी कदम रुकने न देना,
चाहे सारे दीप बुझ जाएँ।

तूफानों से जो डर जाए,
वह नाव किनारे रह जाती है,
जो लहरों से लड़ना सीख ले,
उसी की कहानी बन जाती है।

दर्द अगर साथी बन जाए,
तो उसे भी मित्र बना लेना,
गिर कर फिर उठने की ताकत
अपने भीतर जगा लेना।

याद रखो यह जीवन पथ है,
परीक्षाएँ आती रहेंगी,
पर जो हार मान ले मन से,
मंज़िल उससे दूर रहेंगी।

इसलिए उठो, फिर चल पड़ो,
चाहे कितनी भी रात घनेरी हो,
कभी भी नहीं हारना जीवन में,
क्योंकि हर अंधेरी रात के बाद
एक नई सुबह सुनहरी हो। 🌅

Wednesday, 25 February 2026

जब हवा चलती है, घास झुकती है

 

जब हवा चलती है, घास झुकती है

जब हवा चलती है,
घास झुकती है —
टूटती नहीं,
रूठती नहीं।

वह जानती है,
आकाश से लड़ना
उसका धर्म नहीं;
धरती से जुड़ना
उसकी शक्ति है।

आंधी आती है,
वह विनम्र हो जाती है;
तूफ़ान जाता है,
वह फिर सीधी हो जाती है।

न शिकायत,
न प्रतिकार —
बस मौन में स्वीकार।

नेतृत्व भी ऐसा ही हो —
अहंकार से नहीं,
संतुलन से खड़ा;
जड़ से जुड़ा,
पर दिशा के साथ मुड़ा।

जो झुकना जानता है,
वही टिकना जानता है;
जो लचीला है,
वही स्थिर है।

जब हवा चलती है,
घास झुकती है —
और इसी में
उसकी बुद्धिमानी है। 

Tuesday, 24 February 2026

जहाँ विद्यार्थी अंक नहीं, अंकुर हों

 अभागे होते वे स्कूल

जहाँ दीवारें ऊँची होती हैं,
पर दृष्टि छोटी।

जहाँ घंटी तो रोज़ बजती है,
पर चेतना नहीं जागती।

जहाँ किताबें खुलती हैं,
पर मन बंद रहते हैं।

जहाँ अंक बढ़ते हैं,
पर अंकुर नहीं।

अभागे होते वे स्कूल
जहाँ लक्ष्य केवल परीक्षा हो,
और जीवन पाठ्यक्रम से बाहर।

जहाँ प्रश्न पूछना उद्दंडता हो,
और मौन ही अनुशासन।

जहाँ शिक्षक पढ़ाते तो हैं,
पर प्रज्वलित नहीं करते।

जहाँ बच्चे चलते तो हैं,
पर दिशा नहीं जानते।

सौभाग्यशाली होते वे विद्यालय
जहाँ हर प्रार्थना में उद्देश्य हो,
हर कक्षा में करुणा,
हर गलियारे में जिज्ञासा,
और हर शिक्षक में प्रकाश।

जहाँ शिक्षा नौकरी नहीं,
एक साधना हो।
जहाँ विद्यार्थी अंक नहीं,
अंकुर हों।

और जहाँ विद्यालय भवन नहीं,
एक जीवंत चेतना हो।

Wednesday, 18 February 2026

युवा और फिल्मी हीरो

युवा और फिल्मी हीरो

ओ नौजवान, ज़रा ठहर कर देख,

जिसे तू हीरो मान चला है,

वो परदे का बस एक किरदार,

सच में कितना साथ चला है?

बाल बिखेरे, स्टाइल अनोखी,

गुस्से में तोड़े हर दीवार,

तू भी समझे यही है ताकत,

यही है जीवन का आकार।

पर असली दुनिया अलग कहानी,

यहाँ नहीं चलता संवादों का शोर,

यहाँ पसीना, धैर्य, अनुशासन,

बनाते इंसान को मजबूत और।

जिसे तू फॉलो करता है,

वो अभिनय की रोशनी में है,

पर असली हीरो वो बनता,

जो अँधेरे में भी सच के संग है।

सीमा पर खड़ा सैनिक चुप है,

कंधों पर जिम्मेदारी भारी,

घर-घर मेहनत करता मजदूर,

नहीं उसे मिलती ताली सारी।

युवा है तू, ऊर्जा है तेरी,

क्यों दे इसे बस स्टाइल के नाम?

देश, समाज और अपने सपनों,

सबको चाहिए तेरा काम।

हीरो वही जो राह बनाए,

भीड़ नहीं, खुद सोच सके,

अनुशासन, ज्ञान और संस्कार से,

अपनी नई पहचान रखे।

ओ युवा, तू ट्रेंड नहीं, तू परिवर्तन है,

तू शोर नहीं, तू निर्माण है,

फिल्में देख — पर समझ के साथ,

तेरे हाथों में ही कल का मान है।

Monday, 16 February 2026

“हर जगह न्याय नहीं मिलेगा”

 

 “हर जगह न्याय नहीं मिलेगा”

दुनिया न्यायालय नहीं है।
कई जगह शक्ति > सत्य होती है।

यह समझ लेना हार नहीं है,
यह यथार्थ-बोध है।

जो व्यक्ति हर जगह न्याय ढूँढता है,
वह निराश हो जाता है।
जो व्यक्ति व्यवस्था को समझता है,
वह रणनीति बनाता है।