आत्मजागरण की कविता
मत मारो स्वयं को,
तुम्हारा जीवन अमूल्य है।
क्यों किसी के भरोसे रहते हो
कि कोई तुम्हें खुशी देगा?
खुशी कोई और नहीं देता,
वह तो भीतर से जन्म लेती है।
भूल जाओ उन पुरानी जगहों को
जिन्होंने कभी सुख दिया था।
न वह समय लौटेगा,
न वे लोग,
न वही परिस्थितियाँ।
जीवन एक नदी की तरह है—
वह कभी पीछे नहीं बहती।
वह बस आगे बढ़ती है,
नए रास्ते बनाती है,
नई धुन गाती है।
तुम भी नदी बनो—
बहते रहो,
रुकना मत,
और अपने भीतर
नया आनंद खोजते रहो। 🌊✨
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