Sunday, 5 April 2026

 जीने की राह – शुरुआत


कक्षा ग्यारह की वो दोपहर,

जब शब्दों ने ली पहली लहर।

“आईना” समझा रहे थे पारे सर,

भावों का खुला नया सा घर।


उनकी वाणी में था जादू,

हर पंक्ति में जीवन का साधु।

सुनते-सुनते मन यूँ बहका,

एक छात्र ने लिखना सीखा।


कलम उठी, भाव जागे,

अक्षर अपने रास्ते भागे।

यहीं से शुरू हुई वो चाह—

लिखने लगा मैं "जीने की राह"।

Saturday, 4 April 2026

“क्यों जपूँ नाम?”

 

“क्यों जपूँ नाम?”

क्यों भगवान के नाम जपूँ
क्या इसलिए कि वो कुछ देंगे?
क्या सौदा है ये भक्ति का
कि बदले में सुख ही मिलेंगे?

क्यों उन पर पूजा-पाठ का
मैं कोई एहसान करूँ?
जो स्वयं सबका आधार हैं
उन्हें मैं क्या अर्पण करूँ?

क्यों उनके होते हुए भी
रो-रो कर ये जतलाऊँ मैं,
कि वो मेरा ख्याल नहीं रखते—
क्या इतना अंधा हो जाऊँ मैं?

साँस-साँस में वो बसते हैं,
हर धड़कन में उनका नाम,
फिर भी मैं बाहर ढूँढ रहा
अपना ही खोया हुआ धाम।

भक्ति अगर व्यापार बने,
तो प्रेम कहाँ रह जाएगा?
स्वार्थ के इस छोटे घेरे में
ईश्वर भी सिमट जाएगा।

अब समझा हूँ—नाम जपूँ
तो बस अपने मन को शांत करूँ,
उनसे कुछ पाने के लिए नहीं,
खुद को उनके योग्य करूँ।

ना कोई सौदा, ना अपेक्षा,
बस एक सरल सा भाव रहे—
जो कुछ भी है, जैसा भी है,
सबमें तेरा ही प्रभाव रहे।

Tuesday, 10 March 2026

आत्मजागरण की कविता

 आत्मजागरण की कविता

मत मारो स्वयं को,
तुम्हारा जीवन अमूल्य है।

क्यों किसी के भरोसे रहते हो
कि कोई तुम्हें खुशी देगा?
खुशी कोई और नहीं देता,
वह तो भीतर से जन्म लेती है।

भूल जाओ उन पुरानी जगहों को
जिन्होंने कभी सुख दिया था।
न वह समय लौटेगा,
न वे लोग,
न वही परिस्थितियाँ।

जीवन एक नदी की तरह है—
वह कभी पीछे नहीं बहती।
वह बस आगे बढ़ती है,
नए रास्ते बनाती है,
नई धुन गाती है।

तुम भी नदी बनो—
बहते रहो,
रुकना मत,
और अपने भीतर
नया आनंद खोजते रहो। 🌊✨

Saturday, 7 March 2026

अपमान से सीखो

 सीखो —

हार से सीखो,
अपमान से सीखो,
धोखे की उस आग से सीखो
जो भीतर सब कुछ जला देती है।

जब अपमान का ज़हर
सीने में उतरता है,
जब विश्वास टूटकर
हजार टुकड़ों में बिखरता है,
जब रातें लंबी हो जाती हैं
और आँसू ही साथी बन जाते हैं—
तब मन चीखता है,
“अब बस… अब और नहीं!”

पर उसी क्षण
एक सच्चा योद्धा जन्म लेता है।

वह अपने आँसुओं को
कमज़ोरी नहीं बनने देता,
वह अपने घावों को
हार नहीं बनने देता।

वह दर्द को पकड़ता है,
उसे आग बनाता है,
और उसी आग में
अपना नया भाग्य गढ़ता है।

याद रखो —
अपमान तुम्हें तोड़ने नहीं आया,
वह तुम्हें जगाने आया है।

धोखा तुम्हें गिराने नहीं आया,
वह तुम्हें दुनिया की सच्चाई दिखाने आया है।

और हार?
हार तुम्हें खत्म करने नहीं आई—
वह तुम्हें सिखाने आई है
कि कैसे अजेय बनते हैं।

इसलिए उठो…
आँसू पोंछो…
दिल में आग भरो…

और दुनिया को बता दो —
तुम वह इंसान हो
जो दर्द में भी खड़ा रहता है,
जो टूटकर भी नहीं बिखरता,
और जो हर घाव से
एक नया इतिहास रचता है।

क्योंकि याद रखो —
दर्द केवल घाव नहीं देता,
वह भीतर जागरण जगाता है,
और उसी जागरण से
एक नया योद्धा जन्म पाता है।

“कभी भी नहीं हारना”

 कविता: “कभी भी नहीं हारना” 

कभी भी नहीं हारना,
चाहे कितना भी दिल जले,
आँसू भीतर ही बहते हों,
और मन चुपचाप सहे।

आत्मा यदि पीड़ा से भरी हो,
रास्ते धुंधले पड़ जाएँ,
फिर भी कदम रुकने न देना,
चाहे सारे दीप बुझ जाएँ।

तूफानों से जो डर जाए,
वह नाव किनारे रह जाती है,
जो लहरों से लड़ना सीख ले,
उसी की कहानी बन जाती है।

दर्द अगर साथी बन जाए,
तो उसे भी मित्र बना लेना,
गिर कर फिर उठने की ताकत
अपने भीतर जगा लेना।

याद रखो यह जीवन पथ है,
परीक्षाएँ आती रहेंगी,
पर जो हार मान ले मन से,
मंज़िल उससे दूर रहेंगी।

इसलिए उठो, फिर चल पड़ो,
चाहे कितनी भी रात घनेरी हो,
कभी भी नहीं हारना जीवन में,
क्योंकि हर अंधेरी रात के बाद
एक नई सुबह सुनहरी हो। 🌅

Wednesday, 25 February 2026

जब हवा चलती है, घास झुकती है

 

जब हवा चलती है, घास झुकती है

जब हवा चलती है,
घास झुकती है —
टूटती नहीं,
रूठती नहीं।

वह जानती है,
आकाश से लड़ना
उसका धर्म नहीं;
धरती से जुड़ना
उसकी शक्ति है।

आंधी आती है,
वह विनम्र हो जाती है;
तूफ़ान जाता है,
वह फिर सीधी हो जाती है।

न शिकायत,
न प्रतिकार —
बस मौन में स्वीकार।

नेतृत्व भी ऐसा ही हो —
अहंकार से नहीं,
संतुलन से खड़ा;
जड़ से जुड़ा,
पर दिशा के साथ मुड़ा।

जो झुकना जानता है,
वही टिकना जानता है;
जो लचीला है,
वही स्थिर है।

जब हवा चलती है,
घास झुकती है —
और इसी में
उसकी बुद्धिमानी है। 

Tuesday, 24 February 2026

जहाँ विद्यार्थी अंक नहीं, अंकुर हों

 अभागे होते वे स्कूल

जहाँ दीवारें ऊँची होती हैं,
पर दृष्टि छोटी।

जहाँ घंटी तो रोज़ बजती है,
पर चेतना नहीं जागती।

जहाँ किताबें खुलती हैं,
पर मन बंद रहते हैं।

जहाँ अंक बढ़ते हैं,
पर अंकुर नहीं।

अभागे होते वे स्कूल
जहाँ लक्ष्य केवल परीक्षा हो,
और जीवन पाठ्यक्रम से बाहर।

जहाँ प्रश्न पूछना उद्दंडता हो,
और मौन ही अनुशासन।

जहाँ शिक्षक पढ़ाते तो हैं,
पर प्रज्वलित नहीं करते।

जहाँ बच्चे चलते तो हैं,
पर दिशा नहीं जानते।

सौभाग्यशाली होते वे विद्यालय
जहाँ हर प्रार्थना में उद्देश्य हो,
हर कक्षा में करुणा,
हर गलियारे में जिज्ञासा,
और हर शिक्षक में प्रकाश।

जहाँ शिक्षा नौकरी नहीं,
एक साधना हो।
जहाँ विद्यार्थी अंक नहीं,
अंकुर हों।

और जहाँ विद्यालय भवन नहीं,
एक जीवंत चेतना हो।