Wednesday, 25 February 2026

जब हवा चलती है, घास झुकती है

 

जब हवा चलती है, घास झुकती है

जब हवा चलती है,
घास झुकती है —
टूटती नहीं,
रूठती नहीं।

वह जानती है,
आकाश से लड़ना
उसका धर्म नहीं;
धरती से जुड़ना
उसकी शक्ति है।

आंधी आती है,
वह विनम्र हो जाती है;
तूफ़ान जाता है,
वह फिर सीधी हो जाती है।

न शिकायत,
न प्रतिकार —
बस मौन में स्वीकार।

नेतृत्व भी ऐसा ही हो —
अहंकार से नहीं,
संतुलन से खड़ा;
जड़ से जुड़ा,
पर दिशा के साथ मुड़ा।

जो झुकना जानता है,
वही टिकना जानता है;
जो लचीला है,
वही स्थिर है।

जब हवा चलती है,
घास झुकती है —
और इसी में
उसकी बुद्धिमानी है। 

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