जब हवा चलती है, घास झुकती है
जब हवा चलती है,
घास झुकती है —
टूटती नहीं,
रूठती नहीं।
वह जानती है,
आकाश से लड़ना
उसका धर्म नहीं;
धरती से जुड़ना
उसकी शक्ति है।
आंधी आती है,
वह विनम्र हो जाती है;
तूफ़ान जाता है,
वह फिर सीधी हो जाती है।
न शिकायत,
न प्रतिकार —
बस मौन में स्वीकार।
नेतृत्व भी ऐसा ही हो —
अहंकार से नहीं,
संतुलन से खड़ा;
जड़ से जुड़ा,
पर दिशा के साथ मुड़ा।
जो झुकना जानता है,
वही टिकना जानता है;
जो लचीला है,
वही स्थिर है।
जब हवा चलती है,
घास झुकती है —
और इसी में
उसकी बुद्धिमानी है।
No comments:
Post a Comment