कविता: “कभी भी नहीं हारना”
कभी भी नहीं हारना,
चाहे कितना भी दिल जले,
आँसू भीतर ही बहते हों,
और मन चुपचाप सहे।
आत्मा यदि पीड़ा से भरी हो,
रास्ते धुंधले पड़ जाएँ,
फिर भी कदम रुकने न देना,
चाहे सारे दीप बुझ जाएँ।
तूफानों से जो डर जाए,
वह नाव किनारे रह जाती है,
जो लहरों से लड़ना सीख ले,
उसी की कहानी बन जाती है।
दर्द अगर साथी बन जाए,
तो उसे भी मित्र बना लेना,
गिर कर फिर उठने की ताकत
अपने भीतर जगा लेना।
याद रखो यह जीवन पथ है,
परीक्षाएँ आती रहेंगी,
पर जो हार मान ले मन से,
मंज़िल उससे दूर रहेंगी।
इसलिए उठो, फिर चल पड़ो,
चाहे कितनी भी रात घनेरी हो,
कभी भी नहीं हारना जीवन में,
क्योंकि हर अंधेरी रात के बाद
एक नई सुबह सुनहरी हो। 🌅
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