अभागे होते वे स्कूल
जहाँ दीवारें ऊँची होती हैं,
पर दृष्टि छोटी।
जहाँ घंटी तो रोज़ बजती है,
पर चेतना नहीं जागती।
जहाँ किताबें खुलती हैं,
पर मन बंद रहते हैं।
जहाँ अंक बढ़ते हैं,
पर अंकुर नहीं।
अभागे होते वे स्कूल
जहाँ लक्ष्य केवल परीक्षा हो,
और जीवन पाठ्यक्रम से बाहर।
जहाँ प्रश्न पूछना उद्दंडता हो,
और मौन ही अनुशासन।
जहाँ शिक्षक पढ़ाते तो हैं,
पर प्रज्वलित नहीं करते।
जहाँ बच्चे चलते तो हैं,
पर दिशा नहीं जानते।
सौभाग्यशाली होते वे विद्यालय
जहाँ हर प्रार्थना में उद्देश्य हो,
हर कक्षा में करुणा,
हर गलियारे में जिज्ञासा,
और हर शिक्षक में प्रकाश।
जहाँ शिक्षा नौकरी नहीं,
एक साधना हो।
जहाँ विद्यार्थी अंक नहीं,
अंकुर हों।
और जहाँ विद्यालय भवन नहीं,
एक जीवंत चेतना हो।
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