“क्यों जपूँ नाम?”
क्यों भगवान के नाम जपूँ
क्या इसलिए कि वो कुछ देंगे?
क्या सौदा है ये भक्ति का
कि बदले में सुख ही मिलेंगे?
क्यों उन पर पूजा-पाठ का
मैं कोई एहसान करूँ?
जो स्वयं सबका आधार हैं
उन्हें मैं क्या अर्पण करूँ?
क्यों उनके होते हुए भी
रो-रो कर ये जतलाऊँ मैं,
कि वो मेरा ख्याल नहीं रखते—
क्या इतना अंधा हो जाऊँ मैं?
साँस-साँस में वो बसते हैं,
हर धड़कन में उनका नाम,
फिर भी मैं बाहर ढूँढ रहा
अपना ही खोया हुआ धाम।
भक्ति अगर व्यापार बने,
तो प्रेम कहाँ रह जाएगा?
स्वार्थ के इस छोटे घेरे में
ईश्वर भी सिमट जाएगा।
अब समझा हूँ—नाम जपूँ
तो बस अपने मन को शांत करूँ,
उनसे कुछ पाने के लिए नहीं,
खुद को उनके योग्य करूँ।
ना कोई सौदा, ना अपेक्षा,
बस एक सरल सा भाव रहे—
जो कुछ भी है, जैसा भी है,
सबमें तेरा ही प्रभाव रहे।
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