Sunday, 5 April 2026

 जीने की राह – शुरुआत


कक्षा ग्यारह की वो दोपहर,

जब शब्दों ने ली पहली लहर।

“आईना” समझा रहे थे पारे सर,

भावों का खुला नया सा घर।


उनकी वाणी में था जादू,

हर पंक्ति में जीवन का साधु।

सुनते-सुनते मन यूँ बहका,

एक छात्र ने लिखना सीखा।


कलम उठी, भाव जागे,

अक्षर अपने रास्ते भागे।

यहीं से शुरू हुई वो चाह—

लिखने लगा मैं "जीने की राह"।

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