Saturday, 11 July 2026

मेरी जड़ता का पर्वत

 

मेरी जड़ता का पर्वत

मेरी जड़ता का टूटना इतना सरल नहीं है,
हे परमात्मा!
तुम्हें बहुत श्रम करना होगा।
युगों से जमी इस कठोरता को पिघलाने में
शायद तुम्हें भी मेरी पीड़ा के मार्ग से होकर गुजरना पड़े।

मैं स्वर्ण-मृग से भी अधिक छलपूर्ण हूँ;
मेरा मन प्रतिक्षण नए भ्रम रचता है।
मैं खर-दूषण से भी अधिक धूर्त हूँ;
अपने ही विवेक को छलकर
बार-बार अंधकार का पक्ष लेता हूँ।

मेरी मूर्खता की कोई सीमा नहीं,
मेरी जड़ता का कोई किनारा नहीं।
अहंकार की मोटी परतों के नीचे
मेरी चेतना जैसे सो गई है।

हे कृष्ण!
अपने सुदर्शन चक्र की धार और तीक्ष्ण कर दीजिए।
उसकी धार मेरे शरीर पर नहीं,
मेरे अहंकार पर चले;
मेरे मोह पर चले;
मेरे अज्ञान पर चले;
मेरी जड़ता पर चले।

मेरे भीतर छिपे
महिषासुर का अभिमान,
रावण का दंभ,
कंस का भय,
और शिशुपाल का अपराध—
सब आपके एक संकेत से समाप्त हो जाएँ।

यदि कुछ चाहिए,
तो केवल जागी हुई चेतना चाहिए।

यदि मुझे जगाने के लिए
मेरे भ्रम टूटें,
मेरा अभिमान चूर हो—
तो भी मुझे स्वीकार है।

बस एक वरदान दीजिए प्रभु—
जब आपका सुदर्शन
मेरे अज्ञान को काटे,
तब मैं उस पीड़ा से भागूँ नहीं,
उसे आपकी करुणा का स्पर्श समझ सकूँ।

मेरी जड़ता चाहे जितनी विशाल हो,
आपकी कृपा उससे कहीं अधिक विराट है।
मेरी मूर्खता चाहे जितनी गहरी हो,
आपका प्रकाश उससे कहीं अधिक प्रखर है।

एक दिन ऐसा आए
जब मैं यह न कहूँ कि
"मैं जड़ हूँ"—
बल्कि मौन होकर अनुभव करूँ—

"मैं उसी चेतना का अंश हूँ,
जिससे यह समस्त सृष्टि प्रकाशित है।"

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