Saturday, 11 July 2026

मैं पर्वत से भी भारी हूँ

 मैं पर्वत से भी भारी हूँ

मैं संजीवनी पर्वत से भी भारी हूँ,
हे पवनसुत! मेरे दोषों का भार अपार है।
मैं गोवर्धन से भी भारी हूँ,
हे गिरिधर! मेरा अहंकार ही मेरा संसार है।

मेरी मूर्खता महिषासुर से भी प्रचंड,
मेरे भ्रमों का नहीं कोई अंत।
हर कदम पर मैं स्वयं से हारता हूँ,
अपने ही बनाए अंधेरों में भटकता हूँ।

फिर भी एक आशा भीतर जलती है,
तेरी करुणा कभी नहीं थकती है।
जिसने पर्वत को अँगुली पर धारा,
वह मेरे जीवन का भार भी उतारेगा सारा।

जिसने संजीवनी उठाकर प्राण बचाए,
वह मेरे टूटे हुए विश्वास भी जगाए।
जिसने असुरों का अभिमान मिटाया,
वह मेरे भीतर के अज्ञान को भी हर ले जाएगा।

मैं योग्य नहीं, यह मैं जानता हूँ,
पर तेरे प्रेम की सीमा नहीं मानता हूँ।
मेरी शक्ति समाप्त हो सकती है,
पर तेरी कृपा कभी समाप्त नहीं होती।

इसलिए मैं निराश नहीं हूँ,
मैं अकेला नहीं हूँ।
यदि तू मेरे साथ है प्रभु,
तो मेरा सबसे भारी बोझ भी
तेरी मुस्कान में हल्का हो जाएगा।

हे प्रभु!
मैं भार नहीं बनना चाहता,
मुझे अपने प्रेम में इतना हल्का कर दे
कि एक दिन मेरा मन भी
तेरे नाम की हवा में
हनुमान की छलाँग जैसा निर्भय हो जाए।

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