हे माँ काली! मुझे जगा दो
हे माँ काली!
रक्तबीज के समान मेरी मूर्खता है,
मेरी जड़ता है,
मेरा अज्ञान है।
रक्तबीज का वध करना सरल था,
क्योंकि उसके प्रत्येक रक्तकण से
केवल एक नया असुर जन्म लेता था।
पर मेरे भीतर तो
हर विचार से नया भ्रम जन्म लेता है,
हर इच्छा से नया अहंकार,
हर भय से नया अंधकार।
माँ, मेरी जड़ता का अंत करना
अत्यंत कठिन है।
तुम्हें बहुत श्रम करना होगा।
युगों से जमी इस अचेतनता को
तुम्हारी करुणा ही पिघला सकती है।
मुझे अपनी मूर्खता पर जितना विश्वास है,
उससे कहीं अधिक विश्वास
तुम्हारी कृपा पर है।
मुझे अपने पतन का ज्ञान है,
पर उससे भी अधिक
तुम्हारे उठाने वाले हाथ पर भरोसा है।
हे महाकाली!
अपने ज्ञान-खड्ग से
मेरे अज्ञान का मस्तक काट दो।
अपने करुणामय स्पर्श से
मेरी सोई हुई चेतना जगा दो।
माँ, मुझे चेतना दो।
माँ, मुझे विवेक दो।
माँ, मुझे सत्य का प्रकाश दो।
माँ, मुझे ऐसा हृदय दो
जो केवल तुम्हें ही खोजे।
मैं योग्य नहीं हूँ,
फिर भी तुम्हारा पुत्र हूँ।
माँ, मुझे ठुकराना मत।
मेरे दोष मत गिनो,
मेरी पुकार सुनो।
अपने इस भटके हुए पुत्र को
अपनी गोद में स्थान दो।
मुझे अपने चरणों में बैठाकर
ऐसा जगा दो
कि फिर कभी अज्ञान की नींद न आए।
हे माँ!
मेरा सबसे बड़ा शत्रु संसार नहीं,
मेरा अपना अज्ञान है।
और मेरी सबसे बड़ी आशा भी संसार नहीं—
केवल तुम हो।
माँ, मुझे अपना लो।
मुझे जगा दो।
मुझे चेतना दो।
मुझे ज्ञान दो।
मुझे अपने प्रेम में विलीन कर लो।