हे परमात्मा!
तेरे बनाए इस संसार में
हम माया के जाल में उलझे हैं,
त्रिगुणों के बंधन में बँधे हैं।
कभी रजोगुण हमें दौड़ाता है,
कभी तमोगुण हमें गिराता है,
सत्त्व भी हमें तुझ तक नहीं पहुँचा पाता।
जन्मों से यही खेल चलता रहा।
अब बहुत हुआ, प्रभु।
अब हमें हमारे ही मन से मुक्त कर दो।
माया के पार उतार दो।
अज्ञान के पार उतार दो।
अहंकार के पार उतार दो।
हमें संसार से नहीं,
स्वयं से तार दो।
हे प्रभु!
अब नाव हमारी नहीं,
पतवार भी हमारी नहीं—
अब तुम ही पार उतार दो।
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