Saturday, 11 July 2026

"महत्त्वाकांक्षा का ज़हर"

 "महत्त्वाकांक्षा का ज़हर"

महत्त्वाकांक्षा का ज़हर सबसे पहले उन्हें पीड़ा देता है जो हमारे सबसे क़रीब होते हैं।

वे हमारे सपनों की कीमत चुकाते हैं—
बच्चे, जो हमारे समय के भूखे रह जाते हैं।    
जीवनसाथी, जो हमारे साथ की प्रतीक्षा करता रह जाता है।
माता-पिता, जो हमारी एक मुस्कान के लिए तरस जाते हैं।
मित्र, जिनसे रिश्ते धीरे-धीरे औपचारिक हो जाते हैं।

जब सफलता ही जीवन का एकमात्र लक्ष्य बन जाती है,
तो संवेदनाएँ पीछे छूटने लगती हैं।
घर एक पड़ाव बन जाता है,
और रिश्ते उपलब्धियों के नीचे दबने लगते हैं।

विडंबना यह है कि
जिस सफलता के लिए हम अपनों का साथ खो देते हैं,
उसी सफलता का आनंद लेने के लिए
अंत में वही अपने नहीं बचते।

महत्त्वाकांक्षा अच्छी है,
यदि वह सेवा, सृजन और विकास का माध्यम बने।
लेकिन यदि वह अहंकार, तुलना और अंतहीन दौड़ में बदल जाए,
तो उसका पहला शिकार हमारे सबसे प्रिय लोग बनते हैं,
और अंततः हम स्वयं भी।

इसलिए सफलता का नहीं,
संतुलन का सपना देखिए।
ऐसी ऊँचाइयाँ चुनिए,
जहाँ पहुँचकर अपने भी साथ हों।
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"अनियंत्रित महत्त्वाकांक्षा का पहला शिकार हमारे अपने होते हैं, और अंतिम शिकार हम स्वयं।"

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