प्रत्यभिज्ञा
मैं खोज रहा था जग के मेले में,
नाम, प्रसिद्धि और उजियारे में।
जब भीतर झाँका एक क्षण भर,
मिल गया उत्तर अपने ही द्वारे में।
न मैं केवल यह तन-मन हूँ,
न सीमाओं का कोई बंधन हूँ।
चेतना का अनंत सागर हूँ,
शिव का ही अमर स्पंदन हूँ।
भटका वर्षों मृगतृष्णा बन,
सुख ढूँढ़ा जग के हर वन-उपवन।
जब मौन ने मुझसे बात कही,
तब खुला आत्मा का पावन गगन।
प्रत्यभिज्ञा का दीप जला,
अंतर का सारा तम पिघला।
जो खोज रहा था दूर-दूर,
वह मेरे ही हृदय में निकला।
अब न कोई भय, न कोई भ्रम,
हर प्राणी में दिखता है परम।
स्वयं को जिसने पहचान लिया,
उसने पा लिया जीवन का धर्म।
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