Sunday, 25 October 2015

"शत्रु"

ऐ मेरे विपरीत ध्रुव
तुम वो सब करते हो जो मैं नहीं 
चाहता हूँ
मैं समय का पाबंद,तुम समय के
 प्रति बेपरवाह हो,
जिन परिस्थियों से मैं डरता हूँ
तुम वहा निर्भय रहते हो|
जो रंग मुझे पसंद नहीं,तुम उसी
रंग मैं रंगे हो
जो संगीत मुझे कर्कश लगता है
वही तुम्हारे जीवन का संगीत है
जो भी मुझे नापसंद है वह तुममे
पोषित होता है
शत्रु तुम आशा देते हो 
जीवन की का ध्येय देते हो 
तुम्हारे बिना जीवन में नमक कहाँ!!!!


"दुश्मन"


तुम्हे नहीं पता,मुझे तुम्हारी
कितनी जरुरत है,
आजतक तुमने मुझे मेरे होने का एहसास कराया 
मेरे कमजोर बिन्दुओं पर तुम्हारे ही निशान है,
मेरे भय को,पीड़ा को तुमने ही मुझे दिखाया 
मुझे नहीं लगता,तुम्हारे बिना मेरा जीवन है
जागरण का कारण हो तुम
सयमं का कारण हो तुम
मैं नहीं चाहता  की 
तुम नहीं रहो,
तुम हमेशा रहो
मेरे बुद्ध बनने तक।

Saturday, 24 October 2015

"आवरण"

क्यों नहीं हटता है ,यह आवरण आत्मा पर से,
छुपा रखा है इसने अनन्त ज्ञानस्वरुप को
आवरण में  ,कैद रहना स्वभाव बन गया है

आवरण के भीतर प्रतिपल मरता हु|
आवरण के भीतर सुख है, दुःख है,
पीड़ा है,वासना है,मोह है,अपेक्षा है
नहीं खोना चाहता हु इन सबको
क्योकि आवरण के भीतर रहकर
अपनी तुलना कर पाता किसी से
बेहतर हूँ ,बेहतर  हूँ ,कुछ लोगो से
उन्हें निक्कम्मा समझने का सुख मिलता है,

कृपा करने का मलमली एहसास होता है,
कोई मुझसे गरीब है,कमजोर है
लाचार है,ऐसा  देखता हूँ 
आवरण के भीतर से
कभी कभी किसी का प्रेम
मेरे आवरण को छिनने लगता है

मै डरकर पीछे हटता हु  और आवरण को कस पकड़ता हूँ
डरता हूँ,डरता हूँ की आवरण हट गया तो सत्य सामने आ जायेगा
सत्य सामने आ जायेगा तो मेरा मेरा अहंकार इर्ष्या,लोभ खो जायेंगे
मैं  किसी से कम या किसी से ज्यादा न रह पाउँगा

मैं जो बना हूँ,सुख से,दुःख से
क्रोध से,वासना से,अपेक्षा से,
अहंकार से,इर्ष्या से,तुलना से 
खो जाऊंगा
मैं डरता हूँ,स्वय को खोने से

कृष्ण याने याने आवरण रहित
जिसमे कुछ भी छुपा नहीं है
जिसमे विलीन हुए,तो फिर नहीं खोज पाओंगे
स्वयं को
 कृष्ण हो जाओगे.
कैसा मूढ़ हूँ,कैसा अज्ञानी हु 

आवरण मैं कैद हूँ,स्वयं को कैद कर रखा है
और कृष्ण होने से डरता हूँ|


"संतोष का सूत्र"

जैसे ही कार्य, जिसे मे टाल रहा था
पूर्ण किया,संतोष को पाया
संतोष से किया भोजन
संतोष से पीया पानी
संतोष से ली श्वास
अमूल्य होती है
झूठा संतोष तो होता ही नहीं है|

"स्थिर और चलायमान"

समय स्थिर रहा मैं बदलता रहा
पटरी स्थिर रही रेलगाड़ी दोड़ती रही
हर ध्वनी और द्रश्य मुझे डगमगाते रहे
द्रश्य बदलते रहे ध्वनि बदलती रही
मैंने सबकुछ जानना चाहा
सुनना चाहा
पर दूर से कुछ और ही सुनाई दिया और दिखाई दिया
मेरे सहयात्री जो शायद दूसरी बार
यात्रा कर रहे थे,
उन्होंने हँसकर कहा
यह वो नहीं जो तुम समझ रहे हो
तब समझ में आया सब समझ पर निर्भर है
बाहर स्थिर है
भीतर मन चलायमान है|

"फिसलन"

कही पहुँचना है, पर राह में फिसलन बहुत है
रहीम कहते है प्रेम की गली में
बहुत फिसलन है, यहाँ चीटी के भी पैर फिसलते है
और हम है,जो बैल(अहंकार)
लादकर चलते है

उद्देश्य सही, राह  सही 
 फिर भी क्यों फिसलता हुँ पता नहीं

जिस तरह हल्का सा हवा का झोंका 
अग्नि की लों को हिला देता है
मन भी ऐसे ही डिग जाता है
लो सीधी रहे, ध्यानस्थ रहे
उसके लिए उसे साक्षी की सुरक्षा
देनी होगी
साक्षी की साधना ही असल उद्देश्य है, वरना
टिमटिमाती जिंदगी

हल्के से हवा के झोके से हार जाएगी|

"जीवन और जीवन के बीच"

श्वास और श्वास के बीच
वह जगह जहाँ  जीवन नहीं होता
यदि हम वह खोज ले
पा ले, तो हम मन से मुक्त हो जायेंगे
बुद्ध वहीं स्थिर है
और जीवन मे होने वाली घटनाओ के साक्षी है|
बुद्ध देखते है, श्वास का आना और जाना
उन्हें वहा कुछ भी प्रभावित नहीं कर पाता है|
वहा ना म्रत्यु है न ही जीवन है
अकर्म म्रत्यु है और कर्म जीवन है
बुध्त्व है दोनों के बीच |