Tuesday, 30 December 2025

जो अपमान सह न पाया, वो जिएगा क्या यहाँ?

 जो अपमान सह न पाया, वो जिएगा क्या यहाँ?

यह दुनिया गुलाब नहीं, हर कदम पर है खंजर यहाँ।
जो सच बोलकर भी चुप रहना न सीख सका,
वो इस भीड़ में अकेला रहना न सीख सका।

यहाँ इज़्ज़त नहीं, सहनशीलता बिकती है,
हर रोज़ आत्मा थोड़ी-थोड़ी पिघलती है।
जो हर ताने पर बिखर गया टूटकर,
वो क्या खड़ा होगा समय से आँख मिलाकर?

क्रूर है दुनिया — मान लो यह सच,
यहाँ रोने वाले नहीं, झेलने वाले बचते हैं बस।
अपमान ने जिन्हें फ़ौलाद बना दिया,
इतिहास ने उन्हीं को ज़िंदा कह दिया।

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