Saturday, 21 November 2015

"अदभुत "

कालीदास में  काव्य बाद में 
उदित हुआ 
पहले तो वे उसी डाल  को काट रहे थे 
जिस पर वह बैठे थे ,

प्रयास ,धैर्य ,और श्रद्धा 
से जीवन में काव्य का जन्म होता है 
वह काव्य जो बरसो तक गाया जा सकें 
वह काव्य जिससे प्रेरणा मिले 
उसे पाने का अनुभव 
अदभुत होता है। 




"उपयोगी वस्तुऐ "

एक गिलहरी के लिए 
कुछ रेशे उपयोगी थे 
एक चिड़िया के लिए 
सूखी टहनियाँ उपयोगी थी 
मैंने देखा जो कुछ भी 
मेरे लिए उनुपयोगी था 
वह प्रकृति में अमूल्य था । 

"उसने कहा "

उसने कहा वह बहुत गरीब है ,
उस पर क़र्ज़ है 
वह परेशान है ,
मैं क्या कर सकता हुँ 
उसकी आवाज़ अस्तित्व मे गूंजी 
तभी उसने देखा एक कीट उसके 
पैरो के निचे आने वाला है ,
उसने एक पत्ते पर उसे उठाया 
और एक और रख दिया । 
वह अपने आप को धन्य 
महसूस कर रहा था।  

"मन "

मन कभी दोस्त नहीं होता
गर मरना हो , तो मन को
 मालिक बना लो
गर जीना  हो  तो सेवक बना लो
कभी भला न करेगा वह
कभी जीने न देगा
कहेगा बार बार मर
तेरे लिए नहीं है यह जहाँ,
सब तुझसे ताकतवर है
ज्ञानी है ,समर्थ है
तेज है ,चालक है
हमेशा हतोत्साहित करेगा
पर जैसे ही जागरण होगा 
मन विलुप्त हो जायेगा 
जागरण की रौशनी में 
सत्य उपलब्ध होता है । 


Saturday, 7 November 2015

"मार्केटिंग"

मेरी टॉर्च  से जो दिख रहा था 
उसे ही सत्य मान  रहा था 
और तो और 
दूसरो को भी टॉर्च से 
वही रोशनी  करने को कह रहा था 
जहां मैं देख रहा था 
सभी को कह रहा था 
वही देखो जो  मैं देख रहा हुँ 
किताबें लिख रहा था 
लेख लिख रहा था 
कवितायेँ लिख रहा था 
शोर मचा रहा था 
देखो जो मैं देख रहा हुँ 
जानो जो मैं जान रहा हूँ 
सुनो जो मैं सुन रहा हूँ 
तभी मैने देखा 

आसमान में लालिमा छाने लगी 
धीरे धीरे अँधेरा दूर होने लगा 
रौशनी चारों  और छाने लगी 
सभी ने अपनी अपनी टॉर्च बुझा दी 
मैंने अपनी टोर्च की और देखा 
फिर सूरज  की और देखा ,और सोचा 
मैं रौशनी दिखा रहा था या 
टोर्च बेच रहा था 
अभी तक जो अँधेरा था 
उसने मुझे घेर रखा था या 
मेरी चेतना को।

"मोम का घोड़ा "

मोम के घोड़े से आग का 
दरिया पार  ना होगा 
छोटी छोटी आशाओ से 
चार कदम भी चला न 
जा सकेगा ,

मोम  के घोडे को छोड़ना होगा 
नंगे पैर ही आग पर 
दौड़ना होगा 
जब तुम मोम के घोडे 
से उतरोगे ,पाओगे की 
आग शीतल हो गई 

सिर्फ घोड़े से उतरने का साहस ही 
तुम्हे विजय दिलाएगा 
पर हम खुद से ज्यादा 
खुदा  से ज्यादा 
मोम के घोड़े पर 
विश्वास करते है ।



'अभिषेक"

कभी ऐसा लगता था 
जीवन कीचड़ से सराबोर है ,
अज्ञानता ,अहंकार ,भय की
 धड़कन का नाम ही  जीवन है ,

वह कीचड़ जब किसी पर उछलता 
तब सुख प्राप्त होता प्रतीत होता 
जीवन बस कीचड़ की होली 
बनकर रह गया 

कही किसी पल में 
अमृत की बून्द ,मस्तक पर गिरी 
और उसने वहां के  कीचड़ को धो दिया 

जब कीचड़ को यह पता चला तो 
वह और तेजी से 
उस मस्तक पर गिरी बून्द 
 पर  गिरने लगा 
अमृत की बून्द हंसी और उसने कहा 
मस्तक भाग्यवान है तु 
कभी न झुकना 
तेरा अभिषेक हो चूका है ।