“किशोरावस्था से आज तक” "ये कविताएँ जीवन के उन पलों की अभिव्यक्ति हैं, जहाँ भावनाएँ शब्दों में ढलकर एक राह बनाती हैं — जीने की राह।" -MANOJ PARMAR SIR
Saturday, 21 November 2015
"मन "
मन कभी दोस्त नहीं होता
गर मरना हो , तो मन को
मालिक बना लो
मालिक बना लो
गर जीना हो तो सेवक बना लो
कभी भला न करेगा वह
कभी जीने न देगा
कहेगा बार बार मर
तेरे लिए नहीं है यह जहाँ,
सब तुझसे ताकतवर है
ज्ञानी है ,समर्थ है
तेज है ,चालक है
हमेशा हतोत्साहित करेगा
पर जैसे ही जागरण होगा
मन विलुप्त हो जायेगा
जागरण की रौशनी में
Saturday, 7 November 2015
"मार्केटिंग"
मेरी टॉर्च से जो दिख रहा था
उसे ही सत्य मान रहा था
और तो और
दूसरो को भी टॉर्च से
वही रोशनी करने को कह रहा था
जहां मैं देख रहा था
सभी को कह रहा था
वही देखो जो मैं देख रहा हुँ
किताबें लिख रहा था
लेख लिख रहा था
कवितायेँ लिख रहा था
शोर मचा रहा था
देखो जो मैं देख रहा हुँ
जानो जो मैं जान रहा हूँ
सुनो जो मैं सुन रहा हूँ
आसमान में लालिमा छाने लगी
धीरे धीरे अँधेरा दूर होने लगा
रौशनी चारों और छाने लगी
सभी ने अपनी अपनी टॉर्च बुझा दी
मैंने अपनी टोर्च की और देखा
फिर सूरज की और देखा ,और सोचा
मैं रौशनी दिखा रहा था या
टोर्च बेच रहा था
अभी तक जो अँधेरा था
उसने मुझे घेर रखा था या
मेरी चेतना को।
"मोम का घोड़ा "
मोम के घोड़े से आग का
दरिया पार ना होगा
छोटी छोटी आशाओ से
चार कदम भी चला न
जा सकेगा ,
मोम के घोडे को छोड़ना होगा
नंगे पैर ही आग पर
दौड़ना होगा
जब तुम मोम के घोडे
से उतरोगे ,पाओगे की
आग शीतल हो गई
सिर्फ घोड़े से उतरने का साहस ही
तुम्हे विजय दिलाएगा
पर हम खुद से ज्यादा
खुदा से ज्यादा
मोम के घोड़े पर
'अभिषेक"
कभी ऐसा लगता था
जीवन कीचड़ से सराबोर है ,
अज्ञानता ,अहंकार ,भय की
धड़कन का नाम ही जीवन है ,
वह कीचड़ जब किसी पर उछलता
तब सुख प्राप्त होता प्रतीत होता
जीवन बस कीचड़ की होली
बनकर रह गया
कही किसी पल में
अमृत की बून्द ,मस्तक पर गिरी
और उसने वहां के कीचड़ को धो दिया
जब कीचड़ को यह पता चला तो
वह और तेजी से
उस मस्तक पर गिरी बून्द
पर गिरने लगा
अमृत की बून्द हंसी और उसने कहा
मस्तक भाग्यवान है तु
कभी न झुकना
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