सीखो —
हार से सीखो,
अपमान से सीखो,
धोखे की उस आग से सीखो
जो भीतर सब कुछ जला देती है।
जब अपमान का ज़हर
सीने में उतरता है,
जब विश्वास टूटकर
हजार टुकड़ों में बिखरता है,
जब रातें लंबी हो जाती हैं
और आँसू ही साथी बन जाते हैं—
तब मन चीखता है,
“अब बस… अब और नहीं!”
पर उसी क्षण
एक सच्चा योद्धा जन्म लेता है।
वह अपने आँसुओं को
कमज़ोरी नहीं बनने देता,
वह अपने घावों को
हार नहीं बनने देता।
वह दर्द को पकड़ता है,
उसे आग बनाता है,
और उसी आग में
अपना नया भाग्य गढ़ता है।
याद रखो —
अपमान तुम्हें तोड़ने नहीं आया,
वह तुम्हें जगाने आया है।
धोखा तुम्हें गिराने नहीं आया,
वह तुम्हें दुनिया की सच्चाई दिखाने आया है।
और हार?
हार तुम्हें खत्म करने नहीं आई—
वह तुम्हें सिखाने आई है
कि कैसे अजेय बनते हैं।
इसलिए उठो…
आँसू पोंछो…
दिल में आग भरो…
और दुनिया को बता दो —
तुम वह इंसान हो
जो दर्द में भी खड़ा रहता है,
जो टूटकर भी नहीं बिखरता,
और जो हर घाव से
एक नया इतिहास रचता है।
क्योंकि याद रखो —
दर्द केवल घाव नहीं देता,
वह भीतर जागरण जगाता है,
और उसी जागरण से
एक नया योद्धा जन्म पाता है।