Saturday, 7 March 2026

अपमान से सीखो

 सीखो —

हार से सीखो,
अपमान से सीखो,
धोखे की उस आग से सीखो
जो भीतर सब कुछ जला देती है।

जब अपमान का ज़हर
सीने में उतरता है,
जब विश्वास टूटकर
हजार टुकड़ों में बिखरता है,
जब रातें लंबी हो जाती हैं
और आँसू ही साथी बन जाते हैं—
तब मन चीखता है,
“अब बस… अब और नहीं!”

पर उसी क्षण
एक सच्चा योद्धा जन्म लेता है।

वह अपने आँसुओं को
कमज़ोरी नहीं बनने देता,
वह अपने घावों को
हार नहीं बनने देता।

वह दर्द को पकड़ता है,
उसे आग बनाता है,
और उसी आग में
अपना नया भाग्य गढ़ता है।

याद रखो —
अपमान तुम्हें तोड़ने नहीं आया,
वह तुम्हें जगाने आया है।

धोखा तुम्हें गिराने नहीं आया,
वह तुम्हें दुनिया की सच्चाई दिखाने आया है।

और हार?
हार तुम्हें खत्म करने नहीं आई—
वह तुम्हें सिखाने आई है
कि कैसे अजेय बनते हैं।

इसलिए उठो…
आँसू पोंछो…
दिल में आग भरो…

और दुनिया को बता दो —
तुम वह इंसान हो
जो दर्द में भी खड़ा रहता है,
जो टूटकर भी नहीं बिखरता,
और जो हर घाव से
एक नया इतिहास रचता है।

क्योंकि याद रखो —
दर्द केवल घाव नहीं देता,
वह भीतर जागरण जगाता है,
और उसी जागरण से
एक नया योद्धा जन्म पाता है।

“कभी भी नहीं हारना”

 कविता: “कभी भी नहीं हारना” 

कभी भी नहीं हारना,
चाहे कितना भी दिल जले,
आँसू भीतर ही बहते हों,
और मन चुपचाप सहे।

आत्मा यदि पीड़ा से भरी हो,
रास्ते धुंधले पड़ जाएँ,
फिर भी कदम रुकने न देना,
चाहे सारे दीप बुझ जाएँ।

तूफानों से जो डर जाए,
वह नाव किनारे रह जाती है,
जो लहरों से लड़ना सीख ले,
उसी की कहानी बन जाती है।

दर्द अगर साथी बन जाए,
तो उसे भी मित्र बना लेना,
गिर कर फिर उठने की ताकत
अपने भीतर जगा लेना।

याद रखो यह जीवन पथ है,
परीक्षाएँ आती रहेंगी,
पर जो हार मान ले मन से,
मंज़िल उससे दूर रहेंगी।

इसलिए उठो, फिर चल पड़ो,
चाहे कितनी भी रात घनेरी हो,
कभी भी नहीं हारना जीवन में,
क्योंकि हर अंधेरी रात के बाद
एक नई सुबह सुनहरी हो। 🌅